kanch si ek ladki – 13

“सूरज की पहली किरण सा होता है बचपन..

और बचपन सा होता है हर नया दिन..

डगमगाते क़दमों से गिरता-संभालता हुआ..

मासूम.. अनजान..

फिर हम उसे ले जाते हैं फ़रेब की गलियों में..

उसे दिखाते है दम तोड़ती ख्वाहिशों के बाजार..

किसी का क़त्ल कर देने को तत्पर वहशी नजरों को..

फिर शाम ढले वो बचपन सा दिन

अपनी मासूमियत को छोड़

बन जाता है कुछ-कुछ हम सा…

करुणा रहित परिंदा..

उड़ जाता है..

फिर सुबह की तलाश में..

बचपन सी मासूम मुस्कराहट वाली सुबह की तलाश में…”

कांच सी एक लड़की-13

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